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माघ पूर्णिमा का महत्व
- बुद्धिष्ट कलेंडर की तीसरे चंद्र माह की पूर्णिमा
- बिना अनुमति के 1250 अरहंत पतिसम्भिधाञाण की बैठक
- एहि भिक्खु उपसंपदा
- सभी अभिञ्ञा प्राप्त भिक्खु
- ओवादपतिमोक्ख
- महापरिनिर्वाण की तिथि की घोषणा
- सारिपुत्त ने अरिहंतत्व प्राप्त किया
- अग्रश्रावक (मुख्य शिष्यों) की घोषणा (सारिपुत्त,महामोग्गलान)
- वेलुवन विहार
- आज से 2611 साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन गौतम बुद्ध शासन में प्रथम संघ अधिवेशन (महा संघ सन्निपात) 1250 अरहन्तो के साथ राजगीर वेळुवनाराम में हुआ। भंते सारिपुत्त एवं भंते मोग्गल्लान सहित 250 भिक्षु संघ, भंते उरूवेल काश्यप, भंते नदी कश्यप, भंते गया कश्यप और 1000 भिक्षु लोग इस अधिवेशन में एकत्रित हुए थे, ये सभी बिना अनुमति के बुद्ध से मिलने आये थे।
- आज से 2611 साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन ही शास्ता भगवान बुद्ध जी ने सारिपुत्त अरन्हत थेर जी और महामोग्गल्लान जी को इस गौतम बुद्ध शासन में अग्रश्रावक का पद प्रधान किए थे। ये भी राजगीर वेळुवनाराम आश्रम में ही हुआ।
ऐते देव सहायका आगच्छन्ति, कोलितो उपतिस्सो च, एतं मे सावक युगं ,भविस्सति भद्दं अग्गयुगंति
"भिक्षुओ! यह दो मित्र कोलित (मोग्गल्लान) और उपतिष्य (सारिपुत्र) आ रहे हैं। यह मेरे प्रधान शिष्य युगल होंगे, भद्र-युगल होंगे।"
- आज से 2611 साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन सभी सम्बुद्ध लोगों का उपदेश जो ''ओवाद प्रातिमोक्ष '' नाम का उपदेश शास्ता गौतम बुद्ध जी ने पहली बार वेळुवन आश्रम में एकत्रित भिक्षु लोगों को दिया था । इस में तथागत बुद्ध जी ने ये गाथाएँ बताई । ओवाद प्रातिमोक्ष में पंचशील का उपदेश दिया।
सब्बपापस्स अकरणं - कुसलस्स उपसम्पदा
सचित्तपरियोदपनं - एतं बुद्धान सासनं।
सभी पाप कर्मों को न करना , पुण्यकर्मों की संपदा संचित करना , अपने चित्त को परिशुद्ध करना यही बुद्धों की शिक्षा है ।..
खन्ती परमं तपो तितिक्खा
- निब्बानं परमं वदन्ति बुद्धा
न हि पब्बजितो परूपघाती
- न समणो होति परं विहेठयन्तो।
सहनशीलता और क्षमाशीलता परम तप है । बुद्ध जन निर्वाण को उत्तम बतलाते हैं । दूसरे का घात करने वाला प्रव्रजित नहीं होता और दूसरे को सताने वाला श्रमण नहीं हो सकता।...
अनूपवादो अनूपघातो - पातिमोक्खे च संवरो
मत्तञ्जुता च भत्तस्मिं - पन्तञ्च सयनासनं
अधिचित्ते च आयोगो - एतं बुद्धान सासनं।
- निंदा न करना , घात न करना , भिक्षु - नियमों द्वारा अपने को सुरक्षित रखना , आहार की मात्रा की जानकारी होना , एकांत में सोना - बैठना और चित्त को एकाग्र करने के लिये प्रयत्न में जुटना - यह सभी बुद्धों की शिक्षा हैं।
- आज से 2566 साल पहले माघ पूर्णिमा के दिन यानि महापरिनिर्वाण के 3 महीने के पहले माघ पूर्णिमा के दिन वैशाली में चापाल चैत्य (पावाल चैत्य) स्थान में पापी मार के याचना (मारयाचना सुत्त) से भगवान ने अपने ''आयु संस्कार'' छोड़ दिए। इसके बाद तथागत ने तीन महीने के बाद महापरीनिर्वाण को प्राप्त करने कि घोषणा की।
नोट— (निर्वाण-सभी क्लेशों का क्षय कर देना, परिनिर्वाण- अस्तित्व की प्रक्रिया का अन्त कर देना और महापरिनिर्वाण-केवल सम्यक सम्बुद्ध की काया के त्याग करना) -कभी कभी लोग सामान्य जनमानस के शरीर त्याग को ऐसे नाम से सम्बोधित करते हैं। जोकि मिथ्या है। तीनों शब्दों का अंतिम लक्ष्य से एक ही है लेकिन दृष्टिकोण और अवस्था अलग है।
ऐसा कहने पर भगवान ने पापी मार से यह कहा – “पापी! बेफिक्र हो, न-चिर ही तथागत का परिनिर्वाण होगा। आज से तीन मास बाद तथागत परिनिर्वाण को प्राप्त होंगे।"
तब भगवान ने चापाल चैत्य में स्मृति-संप्रजन्य के साथ आयुसंस्कार ( प्राण- शक्ति) को छोड़ दिया । जिस समय भगवान ने आयु-संस्कार छोड़ा उस समय भीषण प्रकंपनपूर्ण महा भूचाल हुआ, देवदुन्दुभियाँ बजीं। इस बात को जानकर भगवान ने उसी समय यह उदान कहा--
"बुद्ध ने अतुल-तुल उत्पन्न भव-संस्कार (जीवन शक्ति) को छोड दिया । अपने भीतर रत और एकाग्र चित्त हो उन्होंने अपने साथ उत्पन्न कवच को तोड दिया। ''
(महाखंदक, विनय पिटक)
उन अग्रश्रावक अरहन्त थेर सारिपुत्त भिक्खु एवं महामोग्गल्लान भिक्खु जी को कोटि कोटि नमन!
ऐसे महत्वपूर्ण माघ पूर्णिमा के दिन आप सभी लोग उपोसथ धारण करके अप्रमाण पुण्य अर्जित करें।
By Paramattha Dhamma Sikkhaya Foundation
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