तावतिंस देवलोक से बुद्ध पृथ्वी पर पधारे Viewers(2)
तावतिंस देवलोक से बुद्ध पृथ्वी पर आये
(जिसे देवोरोहना (देवों का उदय होना) के नाम से जाना जाता है)
भगवान बद्ध आठवें चंद्रमास की पूर्णिमा पर अपनी माता महामाया
को अभिधम्म की देसना के लिए तावतिंस देवलोक में वर्षावास के
लिए गये थे। जो देवलोक में सेतकेतु देवपुत्त के रूप रह रही थी। बुद्ध
ने तीन महीने तक अभिधम्म की देसना दी, उस समय उनकी माता ने
सोतापन्न अवस्था को प्राप्त किया। जिस प्रकार माताअपने बच्चों का
पालन पोषण करके उन्हें एक अच्छा व्यक्ति बनाती हैं, उसी प्रकारबच्चों
कोअपने माता-पिता की अच्छी तरीके से देखभालव सेवा करनी
चाहिए।और माता-पिता के प्रति सदैव सम्मान का भाव रखना चाहिए।
इसी कारण से भगवान बुद्ध ने भी अपनी माता को देवलोकमें जाकर
अभिधम्म की देसना दी। बुद्ध ने मोग्गलान थेर से कहा कि वर्षावास के अन्तिम दिन बुद्ध संकिसा में आयेगें जहां सारिपुत्त थेर ठहरे हुए हैं,वहां ग्यारवें
चंद्रमास की पूर्णिमा को तथागत आयेगें। बुद्ध के आने से पहले देवताओं के राजा सक्क ने विसनुकम्म देवपुत्त से कहा कि बुद्ध ग्यारवें चंद्रमास
की पूर्णिमा पर संकिसा जायेगें। तो विसनुकम्म देवपुत्त ने तीन सीढियों के मार्ग का निर्माण किया। जो सोने की, चाँदी और हीरे की बनी थी।
दाहिनी ओर सोने की सीढ़ी देवताओं के लिए, बायीं ओर चाँदी की सीढ़ी ब्रह्मा के लिए और बीच में हीरे जवारात की सीढ़ी बुद्ध के लिए,
उन सीढ़ियों का ऊपरी सिरा सुनेरू पर्वत पर टिका था, और सीढ़ियों का निचला सिरा संकिसा के द्वार पर रखा था। वर्षावास के आखिरी दिन बुद्ध
महाब्रह्मा के साथ जोकि बुद्ध के ऊपर छाता लगाये थे। और राजा सक्क बुद्ध का पात्र पकड़े हुए थे। धरती पर सीढ़ियों से उतरें। जैसे ही बुद्ध
पृथ्वी पर उतरे मातुली देवपुत्त ने बुद्ध के मार्ग में पुष्प बिछायें। बुद्ध ने प्रथम पग संकिसा नगर के द्वार पर रखा। जो स्थान बाद में अचल चेतिय
या बुद्ध के पदचिन्हों के नाम से जाना गया। जब बुद्ध ने पृथ्वी पर पग रखते समय ऊपर का ओर देखा तो देवलोक और ब्रह्मलोक प्रकाशित हुए।
तब बुद्ध ने नीचे की ओर देखा तो नरकलोक प्रकाशित हुए। उसी समय पर देवलोक, ब्रह्मलोक, नरकलोक और मनुष्यलोक के प्राणि एक
दूसरे को देख सके। ऐसा कहा जाता हैं, कि उस दिवस को बुद्ध ने 31 भूमियों के लोकों का संसार खोला था।जिस संसार को बुद्ध ने
खोला था। वहाँ तीन लोक थे- स्वर्ग (ब्रह्मलोक देवलोक), नरक (यमलोक) और पृथ्वी (मनुष्यलोक)। तीनों लोकों के सत्व अपने अपने क्षेत्र में
प्रकाशित हुए। पृथ्वी लोक पर मनुष्य मात्र रहते हैं। यमलोक मनुष्य मात्र से निचले स्तर का हैं। नरक के सबसे निचले स्तर को अवेची नरक कहते हैं।
जिस समय भगवान बुद्ध तावतिंस से संकिसा आये उस समय तीनों लोकों के सत्व एक दूसरे को देख सकते थे। भगवान बुद्ध संकिसा में ग्यारवें चन्द्रमास
की प्रर्णिमा में आये थे। सारिपुत्त अरहन्त थेर ने उत्पलवण्णा अरहन्त थेरी के साथ बुद्ध का सबसे पहले स्वागत किया तदपश्चात बुद्ध ने संकिसा नगर में लाखो लोगों को धम्म का उपदेश दिया जो लोग बुद्ध की बुहत लम्बे समय सेप्रतीक्षा कर रहे थे। लगभग 300 मिलियन लोग आर्य पुग्गल हो गये। बुद्ध ने अनुयायियों से एक सावल पूछा कि वो ये घोषणा करें कि बुद्ध के पश्चात सारिपुत्त थेर ही प्रज्ञा के लक्ष्य में हैं। इस विशेष अवसर पर लोगों ने उत्साह के साथ बुद्ध और उनके संघ को भोजन दान दिया। जिसे देवोरोहण दिवस के नाम से जाना जाता हैं। चाहे जितनी दूर पर व्यक्ति खड़ा हो पर जो भोजन बुद्ध को भेंट कर रहे थे। वो उनके पात्र से बाहर नहीं गिरा सीधा उनके पात्र में जा गिरता था। इसलिए बुद्धशासन के लिए संकिसा बहुत ही महत्वपूर्ण और
पूज्यनीय स्थान हैं। संकिसा को अचल चेतिय के नाम से चिन्हित किया गया। जहाँ बुद्ध ने तीनों लोकों के प्राणियों को एक दूसरे को देखने की
अनुमति दी। यह वही स्थान जहाँ पर सारिपुत्त अरहन्त थेर के माध्यम से पहली बार अभिधम्म की देसना पृथ्वी पर दी गयी।
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