अरिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं)

अरिया पुग्गल का धम्म (आर्य पुग्गलो की विशेषताऐं)

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*अरिय पुग्गल का धम्म - आर्य पुद्गलों की विशेषताएँ*

बौद्ध धम्म में 4 प्रकार के अरिय पुग्गल होते हैं -
1. सोतापन्न
2. सकदागामि
3. अनागामि
4. अरहत्त

1. सोतापन्न मग्ग

सोतापन्न मग्ग *अकुसल चित्त 12 में से 5 चित्तों को नष्ट* करता है -
दिट्ठिगत-सम्पयुत्त चित्त 4 और विचिकिच्छा चित्त 1

1.  सोमनस्स-सहगतं दिट्ठिगत-सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
2.  सोमनस्स-सहगतं दिट्ठिगत-सम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
3.  उपेक्खा-सहगतं दिट्ठिगत-सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
4.  उपेक्खा-सहगतं दिट्ठिगत-सम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
5.  उपेक्खा-सहगतं विचिकिच्छा-सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल मोहमूल चित्तं

*सोतापन्न किसे कहते हैं?*
जिसने पहली बार निब्बान की ओर जाने वाली धारा में प्रवेश किया हो और जो कभी भी अपाय भूमि 4 में नहीं जाएगा।

*सोतापन्न के तीन स्तर -*

*1. सत्तक्खत्तुं-परम -* जो देवलोक और मनुष्यलोक में अधिक से अधिक सात बार जन्म लेकर सात जन्मों के अंदर ही अरहत्त अवस्था प्राप्त कर लेगा।

*2. कोलंकोल -* जो अरहत्त होने से पहले 2 से 3 बार अच्छे कुलीन परिवारों में जन्म लेता है।

*3. एकबीजी -* जिसका अरहत्त होने से पहले केवल एक ही बार जन्म होगा।

*सोतापन्न की विशेषताएँ -*
एक सोतापन्न व्यक्ति में बुद्ध, धम्म और संघ के प्रति अटूट सद्धा होती है। वह पाँच शीलों को नहीं तोड़ता और 5 आनन्तरिय कम्म (1. मातुघात, 2. पितुघात, 3. अरहन्तघात, 4. लोहितुप्पाद - बुद्ध के शरीर से खून निकालना, 5. संघभेद) नहीं करता। वह अपाय भूमि में जन्म लेने से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

*सोतापन्न द्वारा प्रहाण -*

*अकुसल कम्मपथ 10 में से 5 का प्रहाण -* पाणातिपाता, अदिन्नादाना, कामेसु मिच्छाचारा, मुसावादा, मिच्छादिट्ठि।

*अकुसल संग्रह 9 का प्रहाण -*
दिट्ठासव, दिट्ठियोग, सीलब्बत-परामास कायगन्थ, इदं सच्चाभिनिवेस कायगन्थ, दिट्ठुपादान, सीलब्बतुपादान, अत्तवादुपादान, विचिकिच्छा नीवरण, दिट्ठानुसय, विचिकिच्छानुसय, दिट्ठि संयोजन, सीलब्बत-परामास संयोजन, विचिकिच्छा संयोजन, इस्सा और मच्छरिय संयोजन, दिट्ठि किलेस और विचिकिच्छा किलेस।

*अकुसल चेतसिक 14 में से 4 का प्रहाण -* दिट्ठि, इस्सा, मच्छरिय, विचिकिच्छा चेतसिक।

 2. सकदागामि

वह अरिय पुग्गल जो पृथ्वीलोक पर एक बार मनुष्य के रूप में वापस आएगा। हो सकता है वह इस जीवन में सकदागामि होकर देवलोक में जन्म ले और फिर अरहत्त होने के लिए मनुष्यलोक में आए।

*सकदागामि के 5 प्रकार -*
1. यहीं मनुष्यलोक में सकदागामि होकर यहीं परिनिब्बान पाने वाला
2. देवलोक में सकदागामि होकर वहीं परिनिब्बान पाने वाला
3. मनुष्यलोक में सकदागामि होकर देवलोक में परिनिब्बान पाने वाला
4. देवलोक में सकदागामि होकर मनुष्यलोक में परिनिब्बान पाने वाला
5. मनुष्यलोक में सकदागामि होकर देवलोक में जाकर फिर मनुष्यलोक में आकर परिनिब्बान पाने वाला

3. अनागामि मग्ग

अनागामि मग्ग *अकुसल चित्त 2 को नष्ट* करता है - दोसमूल चित्त 2

1.  दोमनस्स-सहगतं पटिघ-सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल दोसमूल चित्तं
2.  दोमनस्स-सहगतं पटिघ-सम्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर अकुसल दोसमूल चित्तं

*अनागामि -* जो कामलोक में वापस नहीं आता। ऐसे लोग शुद्धावास (सुद्धावास) में जन्म लेते हैं, जो उच्च ब्रह्म भूमियाँ हैं जहाँ वे अरहत्त होने तक रहते हैं।

*अनागामि के 5 प्रकार -*
1.  *अन्तरा-परिनिब्बायी -* शुद्धावास में अपने जीवन के पहले आधे भाग में ही परिनिब्बान पाने वाला
2.  *उपहच्च-परिनिब्बायी -* आधे से अधिक जीवन जीने के बाद परिनिब्बान पाने वाला
3.  *ससंखार-परिनिब्बायी -* कठिन परिश्रम से परिनिब्बान पाने वाला
4.  *असंखार-परिनिब्बायी -* बिना परिश्रम के परिनिब्बान पाने वाला
5.  *उद्धंसोत अकनिट्ठगामि -* एक ब्रह्मभूमि से उच्चतर ब्रह्मभूमि में जाकर अकनिट्ठ ब्रह्मलोक में परिनिब्बान पाने वाला

4. अरहत्त मग्ग

अरहत्त मग्ग *अकुसल चित्त 12 में से बचे हुए 5 चित्तों को नष्ट* करता है - दिट्ठिगत-विप्पयुत्त चित्त 4 और उद्धच्च चित्त 1

1.  सोमनस्स-सहगतं दिट्ठिगत-विप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
2.  सोमनस्स-सहगतं दिट्ठिगत-विप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
3.  उपेक्खा-सहगतं दिट्ठिगत-विप्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
4.  उपेक्खा-सहगतं दिट्ठिगत-विप्पयुत्तं ससंखारिकं कामावचर अकुसल लोभमूल चित्तं
5.  उपेक्खा-सहगतं उद्धच्च-सम्पयुत्तं असंखारिकं कामावचर अकुसल मोहमूल चित्तं

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